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सोमवार, सितंबर 22, 2008

बोया बीज बबूल का, आम कहां से पाओगे?

एक सप्ताह के अंदर पहले हिंदुस्तान की राजधानी नई दिल्ली, फिर यमन की राजधानी साना और अब पाकिस्तान की राजधानी इसलामाबाद। आतंक के धमाके जहां कहीं भी हों, पीड़ा एक जैसी होती है और पीड़ित आम निर्दोष लोग ही होते हैं। इनकी जितनी भी निंदा की जाए, कम होगी। इस पीड़ा ने मुझे इतना व्यथित कर दिया, कि पिछले कुछ दिनों से मैं कोई पोस्ट नहीं डाल सका।
मुझे गर्व है कि मैं ऋषि मुनियों की धरती हिंदुस्तान में पैदा हुआ, जहां कबीर, रहीम, तुलसीदास और गुरु नानक जी जैसे महान संतों, कवियों और गुरुआें की वाणी जीने की सच्ची राह दिखाती है। मुझे बचपन से ही सिखाया गया था-
जो तोको कांटा बुबै, ताही बोय तू फूल।
तोको फूल के फूल हैं, वाको हैं त्रिशूल।।
दुर्भाग्य से इसी धरती पर पैदा हुए हमारे भाई, जिन्होंने बंटवारे के बाद न केवल पाकिस्तान नाम से अपनी अलग दुनिया बसा ली, बल्कि इस सीख के विपरीत राह पकड़ ली। 'अहिंसा परमो धर्म:` की सीख के साथ महात्मा गांधी ने भले ही हिंदुस्तान को आजादी दिला दी, लेकिन इसी हिंदुस्तान से अलग हुए हमारे पड़ोसियों ने इसे भी अनसुना कर दिया। यह और बात है कि उनके पैगम्बर भी अहिंसा की ही सीख देते हैं, लेकिन उसी पैगम्बर के नाम पर वे पूरी दुनिया के लिए हिंसा और आतंकवाद रूपी कांटे की फसल को सींचते रहे हैं। आज उनकी कांटे की फसल पक कर तैयार हो चुकी है। ये कांटे पूरी दुनिया को चुभ रहे हैं, तो जिस धरती पर फसल बोई गई है उसे कैसे महफूज रखेंगे। ऐसे में हमारा व्यथित हृदय बस यही कह रहा है- बोया बीज बबूल का, आम कहां से पाओगे? साथ में यह गुहार भी लगा रहा है, बहुत हुआ भाई, कांटों की फसल को और खाद-पानी न दो। आओ, साथ मिलकर अमन के बीज बोते हैं, जिससे उपजे शांति के फूल दुनियाभर में खुशबू बिखेरेंगे।

बुधवार, सितंबर 10, 2008

चैनलों को दहशत फैलाने की आजादी कबतक?

महाप्रयोग से धरती का कुछ नहीं बिगड़ा। लेकिन दुखद यह है कि करोड़ों लोगों को मौत का खौफ दिखाकर टीआरपी (यह 'टेरर रेस्पांस पारामीटर` बन रहा है) बढ़ाने वाले चैनलों का भी कुछ नहीं बिगड़ा। किसी वैज्ञानिक या विशेषज्ञ की टिप्पणी के बिना ही कुछ समाचार चैनल दुनिया के खत्म होने की उलटी गिनती करते रहे। न कोई रोक, न कोई टोक, जो मर्जी हो दिखाते रहो। इससे कोई खौफजदा होता है तो होता रहे।
ये चैनल कभी शनि महाराज का खौफ दिखाकर बेखौफ अपनी दुकान चमकाते हैं, तो कभी ग्रहण के दुष्प्रभाव या कुछ और। ऐसे चैनलों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके द्वारा दिखाई गई बेतुकी खबरों से करोड़ों लोग तनाव में आ जाते हैं। नतीजा भी सामने है, उत्तर प्रदेश के कायमगंज (फर्रुखाबाद) में मंगलवार को एक बुजुर्ग टीवी पर इस काल्पनिक महाप्रलय की खबर देख रहे थे। उसी दौरान उनके पोतों ने जब उनसे इसकी चर्चा की तो उनकी सांसें ही थम गइंर्। इसी इलाके में एक कालेज छात्रा को अत्यधिक तनाव के कारण गंभीर हालत में अस्पताल में दाखिल कराया गया है। बच्चों पर इसका असर तो और भी घातक है। देश के करोड़ों बच्चे आज अनिष्ट की आशंका और दहशत के साथ स्कूल गए। यह तो बानगी भर है। पिछले कुछ दिनों में बड़ी संख्या में ऐसे मरीज अस्पताल पहुंचे होंगे, जिनकी बीमारी का सही अनुमान ही नहीं लगाया जा सका होगा।
बिना किसी प्रमाणिकता के बेतुकी खबरें दिखाकर आतंक फैलाने की आजादी आखिर कब तक? ऐसे चैनलों पर यों नहीं तत्काल प्रतिबंध लगा देनी चाहिए?