मुझे गर्व है कि मैं ऋषि मुनियों की धरती हिंदुस्तान में पैदा हुआ, जहां कबीर, रहीम, तुलसीदास और गुरु नानक जी जैसे महान संतों, कवियों और गुरुआें की वाणी जीने की सच्ची राह दिखाती है। मुझे बचपन से ही सिखाया गया था-
जो तोको कांटा बुबै, ताही बोय तू फूल।
तोको फूल के फूल हैं, वाको हैं त्रिशूल।।
दुर्भाग्य से इसी धरती पर पैदा हुए हमारे भाई, जिन्होंने बंटवारे के बाद न केवल पाकिस्तान नाम से अपनी अलग दुनिया बसा ली, बल्कि इस सीख के विपरीत राह पकड़ ली। 'अहिंसा परमो धर्म:` की सीख के साथ महात्मा गांधी ने भले ही हिंदुस्तान को आजादी दिला दी, लेकिन इसी हिंदुस्तान से अलग हुए हमारे पड़ोसियों ने इसे भी अनसुना कर दिया। यह और बात है कि उनके पैगम्बर भी अहिंसा की ही सीख देते हैं, लेकिन उसी पैगम्बर के नाम पर वे पूरी दुनिया के लिए हिंसा और आतंकवाद रूपी कांटे की फसल को सींचते रहे हैं। आज उनकी कांटे की फसल पक कर तैयार हो चुकी है। ये कांटे पूरी दुनिया को चुभ रहे हैं, तो जिस धरती पर फसल बोई गई है उसे कैसे महफूज रखेंगे। ऐसे में हमारा व्यथित हृदय बस यही कह रहा है- बोया बीज बबूल का, आम कहां से पाओगे? साथ में यह गुहार भी लगा रहा है, बहुत हुआ भाई, कांटों की फसल को और खाद-पानी न दो। आओ, साथ मिलकर अमन के बीज बोते हैं, जिससे उपजे शांति के फूल दुनियाभर में खुशबू बिखेरेंगे।