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बुधवार, अक्टूबर 01, 2008

वरना पूरे देश में फैल जाएगा आतंकवाद

नवरात्र की पूर्व संध्या पर सोमवार को गुजरात के मोडासा (साबरकांठा) और महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए विस्फोटों में सात लोगों की मौत हो गई और सौ से अधिक लोग घायल हो गए। स्पष्ट है दिल्ली के चंद दिनों बाद ही आतंकियों ने गुजरात और महाराष्ट्र को निशाना बनाया है। दोनों स्थानों पर धमाकों में मोटरसाइकिल का इस्तेमाल किया गया। इसी दिन उड़ीसा के हिंसा प्रभावित कंधमाल के कई कस्बों में भी कम क्षमता वाले कई धमाके हुए, हालांकि इनमें कोई हताहत नहीं हुआ। उधर, अहमदाबाद के कालूपुर में 17 देसी बम बरामद किए गए।
संकेत साफ हैं, हिंदुस्तान में आतंकवाद बड़े शहरों या किसी खास रीजन तक सीमित नहीं रहा। कुछ समय पहले तक यहां आतंकवाद रीजनल था। कभी कश्मीर में था तो कभी पंजाब में। कभी नार्थ ईस्ट में था तो कभी कहीं और। लेकिन अब यह कस्बों तक पांव पसार रहा है। रोज नए खुलासे हो रहे हैं, जिनमें आतंक के तार नए-नए शहरों से जुड़ते नजर आ रहे हैं। अगर हालात यही रहे तो यह जल्दी ही पूरे देश में फैल जाएगा।
केंद्रीय गृह मंत्रालय की ही मानें तो जयपुर विस्फोट के बाद 140 दिनों में 44 विस्फोट हुए हैं, जिनमें 152 लोग मारे गए और करीब 450 घायल हुए हैं। दुखद यह है कि आतंकी गतिविधियों की सर्वाधिक मार झेलने के बावजूद हम आतंकवाद को मात देने की कोई कारगर रणनीति नहीं बना सके हैं। आतंकवाद से लड़ने के लिए देश में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर कोई सर्वसम्मति नहीं बना सके हैं। आम आदमी की बात तो दूर, राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख राजनेता तक इस बात पर एकमत नहीं हैं कि आतंकवाद के मामले में देश को कितनी सख्ती बरतनी चाहिए। देश को पोटा चाहिए या नहीं, इसे लेकर विभिन्न नेताओं के रोज विरोधाभासी बयान आ रहे हैं।
आतंकवाद से लड़ने को लेकर दुनियाभर में भारत की छवि एक नरम राष्ट्र की है। बड़े आतंकवादी और माफिया सरगना भी पकड़े जाने के बाद सालों तक हमारी जेलों में मेहमान बनकर मुफ्त की रोटियां चट करते रहते हैं। इस दौरान उन्हें छुड़ाने के लिए उनके गुर्गे तरह-तरह के तिकड़म आजमाते हैं। दूसरी ओर माफिया सरगना जेल से ही राजनीति में किस्मत आजमाने के सपने पालने लगते हैं। देश में लंबे समय से एक ऐसी न्यायिक व्यवस्था की मांग उठती रही है, जिसमें बड़े अपराधियों की सजा का फैसला जल्द-से-जल्द हो सके। विस्फोटकों में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों को रखने, बेचने, एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने और इस्तेमाल करने संबंधी कानून में भी तत्काल संशोधन की जरूरत है।
आतंकियों का न कोई मजहब होता है, न ही देश। वे सिर्फ और सिर्फ मानवता के दुश्मन होते हैं। इसलिए समय की मांग है कि सभी दल वोट बैंक की राजनीति छोड़कर और सभी संस्थाएं निजी हित को परे रखकर आतंकवाद को कुचलने के लिए तुरंत एक राय कायम कायम करें।
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गुस्ताखी माफ : वीसी साहब! आपके इरादे नेक नहीं लगते।

शनिवार, सितंबर 27, 2008

वीसी साहब! आपके इरादे नेक नहीं लगते

कुछ लोग काम करने की जगह ढिंढोरा ज्यादा पीटते हैं। ऐसा ही कुछ जामिया मिलिया इसलामिया विश्वविद्यालय के कुलपति मुशीरुल हसन कर रहे हैं। आपने पहले बकायदा संवाददाता सम्मेलन बुलाकर धमाकेदार ऐलान किया कि आतंकी बताए जा रहे अपने दो छात्रों को आप कानूनी मदद मुहैया कराएंगे। फिर लॉबिंग में जुट गए और शुक्रवार को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह के यहां मत्था टेक आए। नतीजा यह हुआ कि जहां कांग्रेस नेता और रामविलास पासवान सहित कई केंद्रीय मंत्री आपके समर्थन में ताल ठोंक रहे हैं, वहीं भाजपाई विरोध में मुखर हैं।
अजी जनाब! आपको अपने बच्चों की मदद करनी थी, करते। किसने रोका है। मदद तो करनी ही चाहिए एक गुरु को अपने शिष्यों की। पहले उन्हें बेगुनाह साबित करते, फिर उस साजिश को भी बेनकाब करते जो आपकी नजर में रची गई थी। लेकिन आपने कुछ करने से पहले चीख-चिल्ला कर एक बात साबित कर दी है कि आपके इरादे काम मुकम्मल होने से ज्यादा पब्लिसिटी पाने की है। जहां तक मैं जानता हूं, इसलाम में जब जकात दी जाती है तो किसी को पता नहीं चलता। यही शर्त मददगार के लिए भी लागू होती है। लेकिन मदद देने से पहले उसे इस तरह से प्रचारित करने के पीछे छिपी आपकी मंशा खतरनाक लगती है।
हिंदुस्तान में आज भी लोग जब अपनी औलाद खराब निकल जाती है तो अखबारों में इश्तिहार छपवा देते हैं कि हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन उसी हिंदुस्तान का कानून फांसी की सजा पाए गुनहगार से भी उसकी आखिरी इच्छा पूछता है। हमारा कानून सबको कानूनी मदद भी देता है। आप भी दे रहे हैं। यह कतई गुनाह नहीं है। लेकिन इसके पीछे जो राजनीति हो रही है, वह गुनाह है।
मेरा आपसे एक सवाल है, जबसे होश संभाला कभी मुरादाबाद में दंगे देखे तो कभी इलाहाबाद में, कभी मेरठ को जलते देखा तो कभी गुजरात को, या आपलोगों ने शिद्दत के साथ कोई लड़ाई लड़ी? नहीं न। अगर लड़ी होती तो आज पुलिस फोर्स में पढ़े-लिखे मुसलमान युवकों की संख्या काफी होती। जनाब! आप उस यूपीए की गोद में बैठ रहे हैं, जिसके नेताओं ने पिछले करीब पांच सालों में मुसलिम वोट बैंक के लिए मौके मिलते ही घड़ियाली आंसू बहाने के अलावा कुछ खास नहीं किया। आप लोग सच्ची बात करने में क्यों हैं? क्या आपने वह कानून पढ़ा है, जिसे पोटा की जगह कांग्रेस ने बनाया है? सिर्फ नाम हटाया है, प्रावधान वही हैं।
आतंकवाद का न कोई धर्म होता है, न ही ईमान। गुरुओं ईमान जरूर होता है। सबसे पहले
गुरुओं को अपने अंदर झांक कर देखना पड़ेगा कि उनकी शिक्षा में कहां कमी रह गई जो हालात इतने खराब हो रहे हैं और युवा भटक रहे हैं।
मेरी दुआ है कि आप अपने मकसद में कामयाब हों और अपने बच्चों को बेगुनाह साबित कर सकें। लेकिन अगर वे वाकई में आतंकवादियों की नापाक साजिशों का शिकार होकर गलत रास्ते पर चल निकले हैं, तो उन्हें रास्ते पर लाने के लिए आपने कुछ सोचा है? अगर आपके छात्रों पर आतंकियों का साथ देने का आरोप सच साबित हो गया तब आप या करेंगे? यह भी आपको अभी ही सोचना पड़ेगा। आपके साथ उन तमाम लोगों को सोचना पड़ेगा, जिन्होंने इस मामले को राजनीतिक बना दिया है।

सोमवार, सितंबर 08, 2008

अखाड़े में फिर बादल-अमरिंदर, कुश्ती जारी है

लोकसभा चुनाव की आहट सुनाई देते ही पंजाब में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह फिर अखाड़े में आमने-सामने हैं। इस समय बादल आक्रामक तेवर में दिख रहे हैं, योंकि अमृतसर इंप्रूवमेंट ट्रस्ट की जमीन के तथाकथित घोटाले के मामले मेंबनी विधानसभा कमेटी ने कैप्टन और उनके मंत्रिमंडल केदो मंत्रियों को दोषी ठहरा दिया है। इससे कैप्टन को रक्षात्मक रवैया अपनाने पर मजबूर होना पड़ा है। अब वेयह कह रहे हैं कि बादल राजनीतिक बदले की भावना सेकाम कर रहे हैं। वह कोई भी कदम उठाने से पहले यह तय कर लें कि कांग्रेस की सरकार बनने पर उनके साथ भी ऐसा ही व्यवहार होगा तो या होगा?
जब कैप्टन मुख्यमंत्री थे तो ऐसा लगता था कि बादल को जेल भिजवाना ही सरकार की पहली प्राथमिकता है। इससमय बादल भी कुछ उसी मूड में दिख रहे हैं और कैप्टन उन्हें कांग्रेस की अगली सरकार बनने पर फिर बदला लेनेकी धमकी दे रहे हैं। कुल मिलाकर इस सियासी कुश्ती को मूकदर्शक बन देख रही राज्य की आम जनता यही सोचरही है कि जल्द ही हार-जीत का फैसला हो, ताकि सरकार और विपक्ष के नेता को जनता से किए उनके वादे याद दिलाए जा सकें। लेकिन महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि से परेशान जनता के हाथ में ऐसा कोई मौका नहीं लगने देना चाहते दोनों नेता, तभी तो कुश्ती जारी है और आगे भी जारी रखने की तैयारी चल रही है।

शनिवार, जुलाई 05, 2008

धर्म की आड़ में सियासी साजिश

जल उठा जम्मू-कश्मीर। आग और भड़की। जाम और तोड़फोड़। हिंसा की चिनगारी दूसरे प्रदेशों तक पहुंची। देशव्यापी बंद और आंदोलन। मामले पर चढ़ा सांप्रदायिक रंग। कई शहरों में कफ्र्यू। फायरिंग में कई जानें गइंर्। मुद्दा अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन आवंटित करने और फिर एक धर्म के लोगों के विरोध के बाद वापस लेने का। किस पक्ष को सही कहें, किसे गलत।
धर्मांधता के इस उबाल में पीछे छूट गइंर् बाबा बर्फानी के भ तों की दुष्वारियां। हजारों किलोमीटर दूर से हजारों रुपये खर्च कर पिछले कुछ दिनों के दौरान जम्मू पहुंचे शिव भ त वहां से आधार शिविर तक जाने-आने में झेली परेशानियों को आजीवन याद रखेंगे। सालों से बुनियादी सुविधाआें को तरसते श्रद्धालुआें को श्राइन बोर्ड की जमीन से कितनी राहत मिल जाएगी, यह समझ से परे है। दूसरी ओर सरकारी जमीन का एक टुकड़ा प्रदेश की एक ऐसी महत्वपूर्ण धार्मिक यात्रा को आवंटित करने, जो प्रदेश के हजारों लोगों की आजीविका से जु़डी है, से किसी को या आपत्ति हो सकती है यह भी एक बड़ा सवाल है।
जिस तरह से आनन-फानन में कई राजनीतिक पार्टियां इस मु े को भुनाने के लिए मैदान में कूदी है, उसे देखते हुए तो यही लगता है कि धर्म की आड़ में यह एक सियासी साजिश है, जिसका मकसद आम लोगों का ध्यान महंगाई और विकास जैसे बुनियादी मुद्दों से हटाना है। गौर करने वाली बात यह भी है कि जम्मू-कश्मीर में भड़की आग की 'रोशनी` में सीमा पर घुसपैठ की कोशिशें तेज हो गई हैं। आखिर कौन दोषी है इस आग के लिए। जब तक आम लोग धार्मिक चादर में छिपे इंसानियत के ऐसे दुश्मनों को नहीं पहचानेंगे, यह आग ऐसे ही लोगों की जानें लेती रहेगी, कभी जम्मू, कभी श्रीनगर, कभी इंदौर तो कभी आपके शहर में।