ठीक एक दिन बाद फिर निभाई जाएगी औपचारिकताएं हिंदी दिवस मनाने की। एक ऐसी राष्ट्रभाषा की, जिसे जो चाहे प्रतिबंधित कर दे। आजादी के ६१ वर्षों में हिन्दी को इतना सम्मान भी नहीं मिल सका कि इसे कोई भी राज्य या संगठन प्रतिबंधित या अपमानित नहीं कर सके। बापू और लाल बहादुर शास्त्री ने जोर देकर कहा था कि हिंदी ही राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोकर रख सकती है। लेकिन आजादी के बाद सत्ता का सुख भोगने वालों ने राष्ट्रभाषा की चिंता कभी नहीं की। किसी ने यदि की भी, तो प्रयास ठोस साबित नहीं हुए। यह और बात है कि इस दौरान हिंदी का लगातार विस्तार हुआ है, लेकिन इसके लिए सरकारी प्रयास नहीं बाजार की नीतियां बधाई के पात्र हैं। पिछले कुछ वर्षों में हिंदी के चैनल, एफएम रेडियो और हिंदी अखबारों का अत्यंत तेजी से विस्तार हुआ, लेकिन राष्ट्रभाषा आज भी दयनीय स्थिति में नजर आती है।
हालत यह है कि महाराष्ट्र में हिंदी में बोलने पर न केवल अभिनेत्री जया बच्चन, बल्कि उनके पति सदी के महानायक कहलाने वाले अमिताभ बच्चन भी बार-बार माफी मांग रहे हैं। (ऐसा महानायक पहले कभी नहीं सुना था)। मुंबई में व्यापारियों को मराठी में बोर्ड लगाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। दूसरी ओर दो दिन पहले ही पंजाब विधानसभा में पंजाब दफ्तरी भाषा संशोधन ए ट २००८ और पंजाब में पंजाबी भाषा एवं अन्य भाषाओं को पढ़ाने संबंधी बिल-२००८ पारित हुआ है। इस संशोधन के बाद पंजाब सरकार के सभी कार्यालयों, सरकारी क्षेत्र के दायरे में आने वाले बोर्ड, कारपोरेशन और लोकल बाडी सहित स्कूलों, कालेजों और विश्वविद्यालयों में सारा कामकाज पंजाबी में ही होगा। साथ ही स्कूलों में पहली से दसवीं तक पंजाबी पढ़ना अनिवार्य हो गया है। अगर कोई इसका उल्लंघन करता है तो उस पर मोटा जुर्माना किया जाएगा।
इस बात पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती कि महाराष्ट्र में मराठी, पंजाब में पंजाबी को सम्मान मिले। लेकिन भारत में ही किसी प्रदेश में हिंदी बोलने वालों को माफी मांगनी पड़े या किसी प्रदेश में सरकारी कामकाज को सिर्फ प्रदेश की भाषा तक सीमित कर दिया जाए, तो राष्ट्रीय अखंडता खतरे में पड़ सकती है। भाषा के आधार पर क्षेत्रीयता के स्वर मुखर होंगे। राज्य के सरकारी दस्तावेज को दूसरे राज्यों के लोग चाह कर भी नहीं पढ़ पाएंगे। कुल मिलाकर एक वृहत राष्ट्र भारत की अवधारणा पर संकट पैदा हो सकता है।
ऐसे में जरूरत इस बात की है कि हिंदी दिवस पर औपचारिकताएं निभाने से ज्यादा कुछ किया जाए। हिंदी को इतना समृद्ध बनाया जाए, ताकि यह पूरे राष्ट्र में आसानी से स्वीकार्य हो और राष्ट्र को सचमुच एक सूत्र में बांध कर रख सके। साथ ही कानून में ऐसे प्रावधान किए जाएं, ताकि किसी प्रदेश में राष्ट्रभाषा अपमानित या प्रतिबंधित न हो। हिंदी से जुडे साहित्यकारों, कलाकारों, पत्रकारों, नेताओं के साथ-साथ राष्ट्रभाषा के तमाम शुभचिंतकों को इस पर गंभीरता से सोचना होगा।
हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग, रो—रो के बात कहने की आदत नहीं रही। (दुष्यंत कुमार)
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शनिवार, सितंबर 13, 2008
शुक्रवार, सितंबर 12, 2008
राष्ट्रभाषा के दुश्मनों, गुस्ताखियां जारी रखो
सैकड़ों जातियों और भाषाआें का देश भारत भले ही अनेक क्षेत्रीयमुद्दों पर उलझा है, लेकिन जब भी कोई तानाशाही ताकत इसकी राष्ट्रीयअस्मिता पर हमले करता है, भारतवासी खुद को एक-दूसरे के औरकरीब पाते हैं। इसके अनेक उदाहरण हमारे इतिहास एवं वर्तमान मेंमौजूद हैं। इसीलिए तो कहा गया है- 'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहींहमारी`।मुंबई में राष्ट्रभाषा हिंदी और हिंदीभाषियों को गाली देने वाले उपद्रवियोंने एक बार फिर इसे सच साबित किया। आज दुनिया भर में यह सवालपूछा जाने लगा है कि मुंबई किसकी? राष्ट्रभाषा के अपमान पर पूरा राष्ट्रचुप यों? महाराष्ट्र वासी भी राष्ट्रभाषा के अपमान से कम आहत नहीं हैं।न तो किसी के हिंदी बोलने से मराठी का अपमान होता है और न हीमराठी बोलने से हिंदी का। भाषा का विवाद सीधे-सीधे बोलने कीआजादी पर हमला है। तभी तो कांग्रेस नेता संजय निरूपम एक टीवी चैनल से बातचीत में दोटूक कहते हैं कि 'सदीके महानायक अमिताभ बच्चन और सुपर हीरो शाहरुख खान ने अपने शहर को छोड़ कर मुंबई का मान बढ़ाया है।मुट्ठीभर लोग सिर्फ पब्लिसिटी के लिए गैरकानूनी तरीके से उनका विरोध कर रहे हैं।`
सदी के महानायक आज भले ही अपनी पत्नी के हिंदी बोलने पर माफी मांगने की जल्दीबाजी में दिखे, लेकिन इससेउनका कद छोटा नहीं हुआ। करोड़ों भारतवासियों में उनका सम्मान बढ़ा ही है। साथ में बढ़ रही है राष्ट्रीय सत्ता औरगांधी परिवार से उनकी नजदीकियां। मुंबई में एक सिनेमाहाल के सीसे टूटने के साथ अमिताभ की नई अंग्रेजीफिल्म को व्यापक प्रचार मिला सो अलग। कुल मिलाकर दावे के साथ कहा जा सकता है कि राष्ट्रभाषा के दुश्मनचाहे जितनी गुस्ताखियां कर लें, राष्ट्रभाषा के प्रति सम्मान बढ़ता ही जाएगा।
सोमवार, सितंबर 08, 2008
है कोई हिंदी का लाल, जो मुझे रोक सके
ये बच्चों को कौन सिखा रहा है कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है।
पता करो, मैं उसका जीना हराम कर दूंगा।
मैं हूं राज ठाकरे, असली मराठी भ त।
यह महाराष्ट्र मेरा है और जिसे यहां रहना है उसे मेरे इशारे पर नाचना होगा।
आज सोमवार को मैं अमिताभ, अभिषेक और जया बच्चन की फिल्मों और हिंदी में किए गए उसके विज्ञापन वाले तमाम उत्पादों का महाराष्ट्र में बहिष्कार करने का फरमान जारी कर रहा हूं।
यह तो शुरुआत है। धीरे-धीरे मैं महाराष्ट्र में हिंदी में बोलने वाले हरेक मुंह पर ताले लगा दूंगा और हिंदी में लिखे गए हर शब्द को मिटा दूंगा।
...
जब भी मैं जोश में होता हूं तो ऐसा ही सोचता हूं। लेकिन फिर होश में आने पर लगता है कहां-कहां से हिंदी मिटाऊंगा? या- या बंद कराऊंगा- उत्पाद, टीवी, अखबार, पत्रिकाएं, किताबें, महाराष्ट्र में आने से या- या रोक पाऊंगा?
फिर सोचता हूं जबतक हिंदी वाले होश में नहीं आते, मुझे अपना जोश बनाए रखना चाहिए।
है कोई हिंदी का लाल, जो मुझे रोक सके???
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