सैकड़ों जातियों और भाषाआें का देश भारत भले ही अनेक क्षेत्रीयमुद्दों पर उलझा है, लेकिन जब भी कोई तानाशाही ताकत इसकी राष्ट्रीयअस्मिता पर हमले करता है, भारतवासी खुद को एक-दूसरे के औरकरीब पाते हैं। इसके अनेक उदाहरण हमारे इतिहास एवं वर्तमान मेंमौजूद हैं। इसीलिए तो कहा गया है- 'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहींहमारी`।
मुंबई में राष्ट्रभाषा हिंदी और हिंदीभाषियों को गाली देने वाले उपद्रवियोंने एक बार फिर इसे सच साबित किया। आज दुनिया भर में यह सवालपूछा जाने लगा है कि मुंबई किसकी? राष्ट्रभाषा के अपमान पर पूरा राष्ट्रचुप यों? महाराष्ट्र वासी भी राष्ट्रभाषा के अपमान से कम आहत नहीं हैं।न तो किसी के हिंदी बोलने से मराठी का अपमान होता है और न हीमराठी बोलने से हिंदी का। भाषा का विवाद सीधे-सीधे बोलने कीआजादी पर हमला है। तभी तो कांग्रेस नेता संजय निरूपम एक टीवी चैनल से बातचीत में दोटूक कहते हैं कि 'सदीके महानायक अमिताभ बच्चन और सुपर हीरो शाहरुख खान ने अपने शहर को छोड़ कर मुंबई का मान बढ़ाया है।मुट्ठीभर लोग सिर्फ पब्लिसिटी के लिए गैरकानूनी तरीके से उनका विरोध कर रहे हैं।`
सदी के महानायक आज भले ही अपनी पत्नी के हिंदी बोलने पर माफी मांगने की जल्दीबाजी में दिखे, लेकिन इससेउनका कद छोटा नहीं हुआ। करोड़ों भारतवासियों में उनका सम्मान बढ़ा ही है। साथ में बढ़ रही है राष्ट्रीय सत्ता औरगांधी परिवार से उनकी नजदीकियां। मुंबई में एक सिनेमाहाल के सीसे टूटने के साथ अमिताभ की नई अंग्रेजीफिल्म को व्यापक प्रचार मिला सो अलग। कुल मिलाकर दावे के साथ कहा जा सकता है कि राष्ट्रभाषा के दुश्मनचाहे जितनी गुस्ताखियां कर लें, राष्ट्रभाषा के प्रति सम्मान बढ़ता ही जाएगा।
महाप्रयोग से धरती का कुछ नहीं बिगड़ा। लेकिन दुखद यह है कि करोड़ों लोगों को मौत का खौफ दिखाकर टीआरपी (यह 'टेरर रेस्पांस पारामीटर` बन रहा है) बढ़ाने वाले चैनलों का भी कुछ नहीं बिगड़ा। किसी वैज्ञानिक या विशेषज्ञ की टिप्पणी के बिना ही कुछ समाचार चैनल दुनिया के खत्म होने की उलटी गिनती करते रहे। न कोई रोक, न कोई टोक, जो मर्जी हो दिखाते रहो। इससे कोई खौफजदा होता है तो होता रहे।
ये चैनल कभी शनि महाराज का खौफ दिखाकर बेखौफ अपनी दुकान चमकाते हैं, तो कभी ग्रहण के दुष्प्रभाव या कुछ और। ऐसे चैनलों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके द्वारा दिखाई गई बेतुकी खबरों से करोड़ों लोग तनाव में आ जाते हैं। नतीजा भी सामने है, उत्तर प्रदेश के कायमगंज (फर्रुखाबाद) में मंगलवार को एक बुजुर्ग टीवी पर इस काल्पनिक महाप्रलय की खबर देख रहे थे। उसी दौरान उनके पोतों ने जब उनसे इसकी चर्चा की तो उनकी सांसें ही थम गइंर्। इसी इलाके में एक कालेज छात्रा को अत्यधिक तनाव के कारण गंभीर हालत में अस्पताल में दाखिल कराया गया है। बच्चों पर इसका असर तो और भी घातक है। देश के करोड़ों बच्चे आज अनिष्ट की आशंका और दहशत के साथ स्कूल गए। यह तो बानगी भर है। पिछले कुछ दिनों में बड़ी संख्या में ऐसे मरीज अस्पताल पहुंचे होंगे, जिनकी बीमारी का सही अनुमान ही नहीं लगाया जा सका होगा।
बिना किसी प्रमाणिकता के बेतुकी खबरें दिखाकर आतंक फैलाने की आजादी आखिर कब तक? ऐसे चैनलों पर यों नहीं तत्काल प्रतिबंध लगा देनी चाहिए?
पिछले कुछ सप्ताह से कई समाचार चैनल जिस 'महाप्रलय का खौफ दिखाकर अपनी टीआरपी बढ़ा रहे थे, उससे अब हम बस कुछ घंटे की दूरी पर हैं। मैं कोई वैज्ञानिक नहीं हूं, लेकिन दावे के साथ कह सकता हूं कि आज यह आखिरी पोस्ट नहीं है। कल भी यह धरती रहेगी और उसपर रहने वाले लोग। कल जो महाप्रयोग होने जा रहा है, वह महाविनाश के लिए नहीं बल्कि महाकल्याण के लिए होगा।
महाप्रयोग के संबंध में जैसा मैंने जाना-
कब होगा : बुधवार को भारतीय समयानुसार ठीक साढ़े बारह बजे महामशीन (लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर) का बटन दबा दिया जाएगा।
कहां होगा : ए सपेरिमेंट टनल स्विट्जरलैंड और फ्रांस की सीमा पर बनाई गई है। इसके लिए जमीन के १७५ मीटर अंदर २७ किलोमीटर वृत्ताकार लंबे टनल में लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (एलएचए) बनाया गया है।
कौन करेगा : जिनेवा स्थित यूरोपियन ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूि लयर रिसर्च के विज्ञानियों के साथ भारतीयों सहित दुनियाभर के करीब ८००० विज्ञानी इसमें सहयोग कर रहे हैं।
कितना खर्च : करीब ५०० बिलियन डॉलर। भारत भी इसमें कई करोड़ डालर का सहयोग कर रहा है।
मशीन के दोनों सिरों से ४५० गीगाबाइट की बीम (किरणें) छाे़डी जाएंगी। ये बीम प्रकाश की गति से आपस में टकराएंगी, जिससे बिग बैंग बनेंगे और एक सेकेंड से कम समय में ही नष्ट हो जाएंगे। इससे निकलने वाली ऊर्जा से कई अवयव निकलेंगे। बाद में कंप्यूटर के जरिए आकलन किया जाएगा कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय बिग बैंग में या हुआ होगा।
क्यों होगा : ब्रह्मांड के अनसुलझे रहस्यों का पता लगाने के लिए। इसके अलावा चिकित्सा विज्ञान से जु़डीं अहम जानकारियां भी मिलेंगी।
नतीजा कब : हजारों विज्ञानी इस महाप्रयोग में पिछले २० वर्षों से जुटे हुए हैं। अब महाप्रयोग के दौरान प्राप्त नतीजों का अध्ययन और विश्लेषण अगले १५-२० साल तक चलता रहेगा।
कौन कहता है कि हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्तां हमारा।
ये बच्चों को कौन सिखा रहा है कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है।
पता करो, मैं उसका जीना हराम कर दूंगा।
मैं हूं राज ठाकरे, असली मराठी भ त।
यह महाराष्ट्र मेरा है और जिसे यहां रहना है उसे मेरे इशारे पर नाचना होगा।
आज सोमवार को मैं अमिताभ, अभिषेक और जया बच्चन की फिल्मों और हिंदी में किए गए उसके विज्ञापन वाले तमाम उत्पादों का महाराष्ट्र में बहिष्कार करने का फरमान जारी कर रहा हूं।
यह तो शुरुआत है। धीरे-धीरे मैं महाराष्ट्र में हिंदी में बोलने वाले हरेक मुंह पर ताले लगा दूंगा और हिंदी में लिखे गए हर शब्द को मिटा दूंगा।
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जब भी मैं जोश में होता हूं तो ऐसा ही सोचता हूं। लेकिन फिर होश में आने पर लगता है कहां-कहां से हिंदी मिटाऊंगा? या- या बंद कराऊंगा- उत्पाद, टीवी, अखबार, पत्रिकाएं, किताबें, महाराष्ट्र में आने से या- या रोक पाऊंगा?
फिर सोचता हूं जबतक हिंदी वाले होश में नहीं आते, मुझे अपना जोश बनाए रखना चाहिए।
है कोई हिंदी का लाल, जो मुझे रोक सके???
लोकसभा चुनाव की आहट सुनाई देते ही पंजाब में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह फिर अखाड़े में आमने-सामने हैं। इस समय बादल आक्रामक तेवर में दिख रहे हैं, योंकि अमृतसर इंप्रूवमेंट ट्रस्ट की जमीन के तथाकथित घोटाले के मामले मेंबनी विधानसभा कमेटी ने कैप्टन और उनके मंत्रिमंडल केदो मंत्रियों को दोषी ठहरा दिया है। इससे कैप्टन को रक्षात्मक रवैया अपनाने पर मजबूर होना पड़ा है। अब वेयह कह रहे हैं कि बादल राजनीतिक बदले की भावना सेकाम कर रहे हैं। वह कोई भी कदम उठाने से पहले यह तय कर लें कि कांग्रेस की सरकार बनने पर उनके साथ भी ऐसा ही व्यवहार होगा तो या होगा?
जब कैप्टन मुख्यमंत्री थे तो ऐसा लगता था कि बादल को जेल भिजवाना ही सरकार की पहली प्राथमिकता है। इससमय बादल भी कुछ उसी मूड में दिख रहे हैं और कैप्टन उन्हें कांग्रेस की अगली सरकार बनने पर फिर बदला लेनेकी धमकी दे रहे हैं। कुल मिलाकर इस सियासी कुश्ती को मूकदर्शक बन देख रही राज्य की आम जनता यही सोचरही है कि जल्द ही हार-जीत का फैसला हो, ताकि सरकार और विपक्ष के नेता को जनता से किए उनके वादे याद दिलाए जा सकें। लेकिन महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि से परेशान जनता के हाथ में ऐसा कोई मौका नहीं लगने देना चाहते दोनों नेता, तभी तो कुश्ती जारी है और आगे भी जारी रखने की तैयारी चल रही है।
'अरे लाउ ने रूपैया... नीतीश फेल कर गया... ये लो पांच सौ रूपैया और बच्चा बोलो लालू जिंदाबाद`। एसी कार में बैठकर टीवी चैनलों के कैमरों की रोशनी में किया गया लालू यादव का यह ड्रामा सचमुच हैरान करने वाला था। शुक्र है कि बच्चा भूख से बिलख रहा था, यदि उसका पेट भरा होता तो शायद वही लालू के झकाझक सफेद कुर्त्ते पर 'बदबूदार दाग` लगाकर इस ड्रामे का जवाब दे देता।
कोसी नदी का कहर झेल रहे लाखों लोगों को राहत दिलाने के लिए प्रधानमंत्री से मुलाकात कर पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव ने बिहार वासियों का ध्यान अपनी ओर खींचा। बाद में रेलवे स्टेशनों पर राहत शिविर लगवाकर, ट्रेनों से बाढ़ पीड़ितों को मुफ्त सुरक्षित स्थानों तक भिजवा कर और फिर देशभर के रेलकर्मियों से एक दिन का वेतन देने की अपील कर रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने तो देशभर के लोगों के दिलों में जगह बना ली। लेकिन इसके बाद शुरू हुआ एक हारे हुए राजनेता लालू यादव का ड्रामा, जिसपर सिर्फ अफसोस किया जा सकता है। राहत शिविरों में भोजन-पानी, दवा-दारू का बेहतर इंतजाम करवा कर मानवता की सेवा करने की जगह लालू यादव कैमरों के आगे चुनावी चंदा बांट कर गरीबों को भरमाने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रतिक्रिया पूछने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह कहना सही है कि यह व त ऐसे ड्रामों और सियासी बयानबाजी का जवाब देने का नहीं है, जमीन पर काम करने का है। लालू जी के दिल में यदि तबाह हुए लाखों गरीब लोगों के लिए सचमुच दर्द है तो पार्टी कार्यकर्ताओँ को उनकी मदद में लगाएं। केंद्र से मिली मदद को नेताओँ के संरक्षण में पलने वाले लुटेरों की फौज से बचाएं। मदद के लिए देश भर से करोड़ों हाथ उठ रहे हैं, उठेंगे, लेकिन सभी के मन में एक ही चिंता है... राहत के असली हकदार कहीं उसका इंतजार ही न करते रह जाएं।
सितंबर माह की पहली तारीख को ज्यादातर समाचार चैनलोंकीभ्रामक खबर से बंदा खुश रहा। चैनलों पर दिनभर ब्रेकिंगन्यूज दिखाईगई कि १५ सितंबर से सभी मोबाइल कंपनियों केरीचार्ज कूपनों परफुल टॉकटाइम मिलेगा। ऐसा निर्देश भारतीयदूरसंचार नियामकप्राधिकरण (ट्राई) ने दिया है। बंदे को लगा किअब वह दिल खोलकरबातें कर सकेगा। खबर को और विस्तार सेजानने के लिए इंटरनेटखंगाला तो समाचार एजेंसियों की खबरोंसे पता चला कि ट्राई का यहनिर्देश सिर्फ 'टॉप-अप` कार्ड के लिएहै। शायद ही कोई मोबाइलधारकहोगा, जिसे रिचार्ज कूपन औरटॉप-अप` कार्ड का अंतर पता नहींहोगा। ऐसे में यदि एजेंसी कीखबर सही है तो समाचार चैनलों में बैठेलोगों की सक्रियता पर सिर पीटने को जी करता है, जिन्हें राततक भीअपनी गलती का पता नहीं चला।
समाचार एजेंसियों के मुताबिक ट्राई ने टेलीकॉम ऑपरेटरों से कहा है कि वे उपभो ताआें से 'टॉप-अप` कार्ड परप्रोसेसिंग शुल्क के नाम पर मनमानी वसूली बंद करें। ट्राई ने प्रोसेसिंग फीस की अधिकतमसीमा दो रुपये तय करदी है। इसके अतिरि त उपभो ताआें को सिर्फ १२.५० फीसदी सेवा कर देनाहोगा। इस निर्देश के बाद ग्राहकों को१५ सितंबर से सिर्फ 'टॉप-अप` कार्ड पर फुल टॉकटाइम मिलेगा।
रिचार्ज कूपन का उपयोग सभी मोबाइल उपभो ताआें को सेवा अवधि (वेलिडिटी) खत्म होने के बादअनिवार्यरूप से करना पड़ता है। जबकि 'टॉप-अप` कार्ड में सिर्फ टॉकटाइम मिलता है, वेलिडिटी नहीं।बड़ी संख्या मेंमोबाइलधारकों को 'टॉप-अप` का उपयोग करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इसके अलावाकई कंपनियां 'टॉप-अप` कार्ड पर पहले से फुल टॉक टाइम दे रही हैं। कुछ कंपनियां, जो 'टॉप-अप` कार्डपर भी मनमाने ढंग से प्रोसेसिंगशुल्क वसूल रही थीं, उनके उपभो ताआें को जरूर इससे फायदाहोगा।
ट्राई के इस आदेश के बाद भी रिचार्ज कूपनों पर मनमानी वसूली जारी रहेगी। टेलीफोन कंपनियां असलखेल` तोयहीं कर रही हैं। उपभो ताआें को पहले सस्ती काल दरों का प्रलोभन देकर फंसाती हैं फिररिचार्ज कूपन में कमटॉकटाइम देकर उन्हें चूना लगा देती हैं। ऐसे में उपभो ताआें के लिए तय करनामुश्किल हो जाता है कि किसकंपनी की सेवा उसके लिए सस्ती है। ट्राई को चाहिए कि रिचार्ज कूपन परभी फुल टॉकटाइम का आदेश जारी करे, ताकि उपभो ताआें को विभिन्न कंपनियों की कॉल दरों मेंअपने लिए बेहतर टैरिफ का चुनाव करने में आसानी ' ' हो।