कुछ लोग काम करने की जगह ढिंढोरा ज्यादा पीटते हैं। ऐसा ही कुछ जामिया मिलिया इसलामिया विश्वविद्यालय के कुलपति मुशीरुल हसन कर रहे हैं। आपने पहले बकायदा संवाददाता सम्मेलन बुलाकर धमाकेदार ऐलान किया कि आतंकी बताए जा रहे अपने दो छात्रों को आप कानूनी मदद मुहैया कराएंगे। फिर लॉबिंग में जुट गए और शुक्रवार को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह के यहां मत्था टेक आए। नतीजा यह हुआ कि जहां कांग्रेस नेता और रामविलास पासवान सहित कई केंद्रीय मंत्री आपके समर्थन में ताल ठोंक रहे हैं, वहीं भाजपाई विरोध में मुखर हैं।
अजी जनाब! आपको अपने बच्चों की मदद करनी थी, करते। किसने रोका है। मदद तो करनी ही चाहिए एक गुरु को अपने शिष्यों की। पहले उन्हें बेगुनाह साबित करते, फिर उस साजिश को भी बेनकाब करते जो आपकी नजर में रची गई थी। लेकिन आपने कुछ करने से पहले चीख-चिल्ला कर एक बात साबित कर दी है कि आपके इरादे काम मुकम्मल होने से ज्यादा पब्लिसिटी पाने की है। जहां तक मैं जानता हूं, इसलाम में जब जकात दी जाती है तो किसी को पता नहीं चलता। यही शर्त मददगार के लिए भी लागू होती है। लेकिन मदद देने से पहले उसे इस तरह से प्रचारित करने के पीछे छिपी आपकी मंशा खतरनाक लगती है।
हिंदुस्तान में आज भी लोग जब अपनी औलाद खराब निकल जाती है तो अखबारों में इश्तिहार छपवा देते हैं कि हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन उसी हिंदुस्तान का कानून फांसी की सजा पाए गुनहगार से भी उसकी आखिरी इच्छा पूछता है। हमारा कानून सबको कानूनी मदद भी देता है। आप भी दे रहे हैं। यह कतई गुनाह नहीं है। लेकिन इसके पीछे जो राजनीति हो रही है, वह गुनाह है।
मेरा आपसे एक सवाल है, जबसे होश संभाला कभी मुरादाबाद में दंगे देखे तो कभी इलाहाबाद में, कभी मेरठ को जलते देखा तो कभी गुजरात को, या आपलोगों ने शिद्दत के साथ कोई लड़ाई लड़ी? नहीं न। अगर लड़ी होती तो आज पुलिस फोर्स में पढ़े-लिखे मुसलमान युवकों की संख्या काफी होती। जनाब! आप उस यूपीए की गोद में बैठ रहे हैं, जिसके नेताओं ने पिछले करीब पांच सालों में मुसलिम वोट बैंक के लिए मौके मिलते ही घड़ियाली आंसू बहाने के अलावा कुछ खास नहीं किया। आप लोग सच्ची बात करने में क्यों हैं? क्या आपने वह कानून पढ़ा है, जिसे पोटा की जगह कांग्रेस ने बनाया है? सिर्फ नाम हटाया है, प्रावधान वही हैं।
आतंकवाद का न कोई धर्म होता है, न ही ईमान। गुरुओं ईमान जरूर होता है। सबसे पहले गुरुओं को अपने अंदर झांक कर देखना पड़ेगा कि उनकी शिक्षा में कहां कमी रह गई जो हालात इतने खराब हो रहे हैं और युवा भटक रहे हैं।
मेरी दुआ है कि आप अपने मकसद में कामयाब हों और अपने बच्चों को बेगुनाह साबित कर सकें। लेकिन अगर वे वाकई में आतंकवादियों की नापाक साजिशों का शिकार होकर गलत रास्ते पर चल निकले हैं, तो उन्हें रास्ते पर लाने के लिए आपने कुछ सोचा है? अगर आपके छात्रों पर आतंकियों का साथ देने का आरोप सच साबित हो गया तब आप या करेंगे? यह भी आपको अभी ही सोचना पड़ेगा। आपके साथ उन तमाम लोगों को सोचना पड़ेगा, जिन्होंने इस मामले को राजनीतिक बना दिया है।
हिंदी ब्लाग की बढ़ती लोकप्रियता के बीच यह सवाल बहस का विषय बनता जा रहा है कि अनाम टिप्पणीकारों को कितनी आजादी दी जाए? सुलझे ब्लागर अपनी पोस्ट पर पक्ष-विपक्ष में की गई तमाम टिप्पणियों का तहेदिल से स्वागत करने को हमेशा उत्सुक रहते हैं। लेकिन पहचान छिपाकर की गई अनाम टिप्पणियां अकसर ब्लागरों की भावनाओं का फर्जी एनकाउंटर करती दिख रही हैं। सुप्रतिम बनर्जी की ताजा पोस्ट 'बटला हाउस : क्या सच, क्या झूठ` और इस पर अनाम 'शूटर` द्वारा दागी गई टिप्पणियों से इसे समझा जा सकता है।
सुप्रतिम ने दिल्ली स्थित बटाला हाउस में हुए एनकाउंटर को अपनी ओर से सही या गलत न ठहराते हुए दोनों पक्षों की भावनाओं को पर्याप्त सम्मान दिया गया है। उन्होंने एनकाउंटर को लेकर आम भारतीय के मन में उठ रहे तमाम सवालों को साहस के साथ बड़ी ही संजीदगी से रखा है। साथ ही अपनी ओर से दो अत्यंत सामयिक मुद्दे उठाए हैं-
'एनकाउंटर फर्जी था या नहीं, ये तो अलहदा मसला है, लेकिन अगर मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी में आजादी के इतने सालों बाद भी पूरी व्यवस्था के खिलाफ ऐसा घोर अविश्वास है, तो ये जरूर विचारणीय है।`
'एनकाउंटर को लेकर उठे सवाल और जारी बहस से एक बात तो साफ हो गई है कि अब लोग पहले की तरह सिर्फ पुलिस की बताई कहानी पर ही आसानी से ऐतबार करने को तैयार नहीं हैं... और ये व त की जरूरत है कि पुलिस भी अपने कामकाज में पारदर्शिता लाए। ताकि एनकाउंटरों पर सवाल तो उठे, लेकिन अगर पुलिस सही है तो उसके पास इन सवालों का सही जवाब जरूर हो।`
ऊपर के दोनों सवालों के पीछे छिपी ब्लागर की वास्तविक भावना को उनकी पूरी पोस्ट पढ़े बिना नहीं समझा जा सकता। लेकिन पोस्ट पढ़े बिना ही धड़ाधड़ टिपियाणे वाले एक पाठक को इनमें से किसी सवाल से ऐसी मिर्ची लगी कि उन्होंने लिख डाला- 'धिक्कार है आप और आप जैसे बेबकूफ लोगों पर।` उनकी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए अनाम 'शूटर` ने ठोका - ' क्या करना चाहिए पुलिस को? पहले मीडिया को फोन करे कि देखो आतंवादी वहां छिपे है हम जा रहे हैं आप भी कैमरा ले लो?` हालांकि इससे आगे बहुत कुछ लिखकर इस 'शूटर` ने अपनी गंभीरता का परिचय भी दिया है लेकिन अपनी पहचान छिपाकर वार करने को क्या कहेंगे?
इस टिप्पणी पर हरि जोशी ने बहुत सही फरमाया है- 'है ईश्वर, इन नासमझ टिप्पणीकर्ताओं को क्षमा करना। ये नहीं जानते कि इनमें और बटला हाउस पर खड़े होकर बकबास करने वालों में कोई फर्क नहीं हैं। इन सभी के पास एक जैसा ही चश्मा है, सिर्फ ब्रांड बदल गया है।` लेकिन अनाम शूटर ने उनपर जवाबी फायरिंग भी कर दी- '...तुम सेन्सेशनल सीकर तो जरूरत से ज्यादा अक्ल वाले हो, एम्बेड जर्नलिस्ट हो, तुम्हारी जगह कहां होगी?`
ऐसी टिप्पणियां गंभीर मुद्दों पर सार्थक बहस को बकबास में डुबो देती हैं। ऐसे अनाम टिप्पणीकारों को क्या कहेंगे आप?
कुछ अखबारों में आज अंदर के पन्ने पर छोटी सी खबर छपी है कि भारत में पिछले दो सालों में भ्रष्टाचार बढ़ा है। खबर में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भारत में चेयरमैन आरएच तहलियानी के हवाले से बताया गया है कि विश्व के भ्रष्ट देशों की सूची में भारत १३ पायदान फिसल कर ७२वें से ८५वें पायदान पर पहुंच गया है। मतलब यह कि दुनिया में ८४ देश ऐसे हैं, जहां भारत से कम भ्रष्टाचार है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल से जु़डी १३ अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने १८० देशों में सर्वेक्षण के बाद यह करप्शन परसेप्शन इंडेक्स तैयार किया है। सर्वे के मुताबिक भारत में चुनावी और राजनीतिक व्यवस्था सबसे ज्यादा भ्रष्ट है। यहां चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल बहुत पैसा खर्च करते हैं और यह पैसा गलत तरीकों से आता है।
मुझे लगता है कि भ्रष्टाचार बढ़ने से भी ज्यादा िचंताजनक पहलू यह है कि हम भ्रष्ट व्यवस्था के आदी हो गए हैं। हालत यह है कि देश में भ्रष्टाचार बढ़ना अब पहले पन्ने की खबर नहीं बनती है। दुनिया के सबसे कम भ्रष्ट देशों क्रमश: डेनमार्क, न्यूजीलैंड, स्वीडन और िसंगापुर से सबक सीखने की बजाय हम इस बात से संतोष करते हैं कि पाकिस्तान इस सूची में १३४वें नंबर पर है। म्यांमार, हैती, इराक और सोमालिया दुनिया के सबसे ज्यादा भ्रष्ट देशों में गिने जाते हैं।
समय की मांग है िक भारत को दुनिया की आर्थिक महाशि त बनाने का दावा करने वाले राजनेता पहले अपना आचरण सुधारें। देश में भ्रष्टाचार कम किए बिना आर्थिक विकास का सपना हकीकत में तब्दील नहीं हो सकता। दुनियाभर के निवेशकों और पर्यटकों का भरोसा जीतने के लिए हमें देश में भ्रष्टाचार कम करने के उपायों पर गंभीरता से सोचना ही होगा। आजादी के बाद से देश में विकास की जितनी योजनाएं बनीं, यदि वे भ्रष्टाचार की भेंट नहीं चढ़ी होती तो आज भारत सचमुच 'सोने की चिड़िया` होता। आज देश को भ्रष्टाचार से आजादी दिलाने के लिए एक क्रांति की जरूरत है। देश इसके लिए युवा राजनेताआें की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहा है। कहा जाता है कि सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते। आशा है 'शाम` होने से पहले यह क्रांति आएगी।
िचत्र गुगल से साभार
जब पड़ोसी के घर क्राइम होता है तो हम पुलिस और कानून-व्यवस्था की खामियों को कोसते हैं। उसी पड़ोसी के घर जब आग लगती है तो हम पानी डाल कर आग बुझाने में जुट जाते हैं, योंकि हमें डर होता है कि पड़ोसी के घर की आग कहीं हमारे घर को भी न जला दे। लेकिन आज हालत यह है कि पड़ोसी की लगाई हुई आतंक रूपी आग हमारे और पड़ोसी दोनों के घरों को जला रही है। ऐसे में खतरा पूरे 'मोहल्ले` के जल जाने का पैदा हो गया है। इसलिए सचेत उन्हें तो होना ही पड़ेगा जिनके घर में आग लगी है, उन्हें भी चौकस होना होगा जो अभी तक सुरक्षित है। आतंकवाद का खतरा अब पूरी दुनिया के लिए एकसमान चिंता का विषय है।
साल भर पहले तक हिंदुस्तान में कहीं आतंकी घटना होती थी तो हमारे नेता इतना बयान देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते थे कि इसमें पड़ोसी देश का हाथ है। लेकिन आज आतंक के साथ इंडियन नाम भी जु़डता दिख रहा है। मामला सिर्फ नाम तक ही सीमित नहीं है, वास्तव में हमारे घर के बच्चे भी गुमराह होकर इस आग को हवा दे रहे हैं। आतंक के अड्डे अब शहरों, पहाड़ों और घने जंगलों तक ही सीमित नहीं हैं, मैदानी इलाकों में स्थित हमारे गांवों में भी पांव पसार रहे हैं। ऐसे में अब खुफिया एजेंसियों, पुलिस और कानून-व्यवस्था की खामियों को कोसने भर से काम नहीं चलने वाला। जरूरत है गुमराह बच्चों को फिर से सही राह पर लाने की। जरूरत है जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा की बंदिशों से ऊपर उठकर सामाजिक तानाबाना और आपसी भरोसे को इतना मजबूत बनाने की, ताकि हमारे बीच से कोई आतंकी पैदा न हो। साथ में जरूरत है कानून को इतना कठोर बनाने की, ताकि कोई विदेशी ताकत हमारे किसी और बच्चे को गुमराह न कर सके। आशा है हमारे नेता भी मामले की गंभीरता को समझेंगे और दलगत भावना से ऊपर उठकर इस आग को बुझाने के लिए एकजुट प्रयास करेंगे।
एक सप्ताह के अंदर पहले हिंदुस्तान की राजधानी नई दिल्ली, फिर यमन की राजधानी साना और अब पाकिस्तान की राजधानी इसलामाबाद। आतंक के धमाके जहां कहीं भी हों, पीड़ा एक जैसी होती है और पीड़ित आम निर्दोष लोग ही होते हैं। इनकी जितनी भी निंदा की जाए, कम होगी। इस पीड़ा ने मुझे इतना व्यथित कर दिया, कि पिछले कुछ दिनों से मैं कोई पोस्ट नहीं डाल सका।
मुझे गर्व है कि मैं ऋषि मुनियों की धरती हिंदुस्तान में पैदा हुआ, जहां कबीर, रहीम, तुलसीदास और गुरु नानक जी जैसे महान संतों, कवियों और गुरुआें की वाणी जीने की सच्ची राह दिखाती है। मुझे बचपन से ही सिखाया गया था-
जो तोको कांटा बुबै, ताही बोय तू फूल।
तोको फूल के फूल हैं, वाको हैं त्रिशूल।।
दुर्भाग्य से इसी धरती पर पैदा हुए हमारे भाई, जिन्होंने बंटवारे के बाद न केवल पाकिस्तान नाम से अपनी अलग दुनिया बसा ली, बल्कि इस सीख के विपरीत राह पकड़ ली। 'अहिंसा परमो धर्म:` की सीख के साथ महात्मा गांधी ने भले ही हिंदुस्तान को आजादी दिला दी, लेकिन इसी हिंदुस्तान से अलग हुए हमारे पड़ोसियों ने इसे भी अनसुना कर दिया। यह और बात है कि उनके पैगम्बर भी अहिंसा की ही सीख देते हैं, लेकिन उसी पैगम्बर के नाम पर वे पूरी दुनिया के लिए हिंसा और आतंकवाद रूपी कांटे की फसल को सींचते रहे हैं। आज उनकी कांटे की फसल पक कर तैयार हो चुकी है। ये कांटे पूरी दुनिया को चुभ रहे हैं, तो जिस धरती पर फसल बोई गई है उसे कैसे महफूज रखेंगे। ऐसे में हमारा व्यथित हृदय बस यही कह रहा है- बोया बीज बबूल का, आम कहां से पाओगे? साथ में यह गुहार भी लगा रहा है, बहुत हुआ भाई, कांटों की फसल को और खाद-पानी न दो। आओ, साथ मिलकर अमन के बीज बोते हैं, जिससे उपजे शांति के फूल दुनियाभर में खुशबू बिखेरेंगे।
महाराष्ट्र में राज ठाकरे की गुंडागर्दी, चुपचाप उसका मुंह देखती मुंबई पुलिस और वोट बैंक के दबाव में अगल-बगल देखते राजनीतिक दलों के बीच पिस रहे हैं मेहनत कर मुंबई को आर्थिक राजधानी का खिताब दिलाने वाले उत्तर भारतीय। मराठियों और उत्तर भारतीयों का रिश्ता क्या सिर्फनफरत का है, दुश्मनी का है? इसके जवाब में प्रस्तुत है वरिष्ठ पत्रकार श्री निशीथ जोशी का एक आलेख--
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राष्ट्रीय आपदा की हकीकत
बिहार में कोसी नदी का जलस्तर घटने के साथ बाढ़ का कहर भले ही कुछ थम गया हो, लेकिन लेकिन करीब एक माह पहले (१८ अगस्त) आई इस राष्ट्रीय आपदा से प्रभावित ४० लाख से अधिक लोगों की जिंदगी अब भी थमी है। लाखों बेघर लोग, जो किसी तरह बच गए, उनके जीने का सारा सामान बाढ़ की भेंट चढ़ गया है। करीब साढ़े तीन सौ राहत शिविरों में तीन लाख से अधिक लोग खाली हाथ जिंदगी की नई शुरुआत के लिए तानाबाना बुन रहे हैं। देशभर से मिल रही सहायता से उन्हें और उनके परिजनों को कुछ दिनों तक भूख से तो बचाया जा सकता है, लेकिन जिंदगी कुछ दिनों की नहीं होती। हजारों लोगों का अता-पता नहीं है। खतरे और भी हैं- यूनीसेफ की टीम ने प्रभावित इलाके में स्वास्थ्य, पोषण, पानी और साफ-सफाई पर विशेष जोर देते हुए संक्रामक बीमारियां फैलने की आशंका जताई है। कोसी का जलस्तर एक बार फिर चढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
और राष्ट्रीय मीडिया का रवैया
सबसे तेज होने और खबरों से पहले पहुंचने जैसे नारे देने वाले राष्ट्रीय चैनलों और ज्यादातर अखबारों को इस राष्ट्रीय आपदा की भनक कई दिनों बाद लगी। भनक लगने के बाद भी दो-तीन दिनों तक तो एक साधारण सी खबर के रूप में इसे निपटा दिया गया। जब आपदा की गंभीरता का अहसास हुआ तो दो-तीन दिनों के लिए विशेष टीम भेज कर सक्रियता दिखाने की कोशिश की। इसका असर भी हुआ, केंद्र सरकार ने सहायता मंजूर करने में आनाकानी नहीं की। लेकिन चंद दिनों बाद ही राष्ट्रीय मीडिया से बिहार की खबरें ऐसे गायब हो गइंर्, जैसे वहां सबकुछ सामान्य हो गया हो। जबकि आज अकेले बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाके से ही रोज दर्जनों 'ह्यूमेन एंगिल स्टोरी` (जीवन के दर्द को यही नाम दिया जाता है मीडिया में) कवर की जा सकती है। दिनभर इस आस में कई बार न्यूज चैनल बदल कर देखता हूं कि शायद किसी को दर्द का अहसास हो रहा होगा, लेकिन वहां तो दिखती है कामेडी और गीतों की महफिल। राष्ट्रीय अखबारों के अंदर के पन्ने पलटता हूं तो वहां गली-मुहल्लों की खबरों और विज्ञापन के बाद इतनी जगह नहीं बचती कि बिहार के दर्द को भी समेटा जा सके। कुल मिलाकर व्यावसायिकता के खेल में मीडिया का बदलता रवैया हैरान करता है।