खबर : दिल्ली के बटला हाउस में हुए एनकाउन्टर की न्यायिक जांच कराने की मांग कर विवादों में घिरे समाजवादी पार्टी महासचिव अमर सिंह ने सोमवार को यू टर्न लेते हुए कहा कि उन्होंने बटला हाउस मुठभे़ड को कभी फर्जी नहीं कहा। उन्होंने कहा, 'मैं यह नहीं कह रहा हूं कि बटला हाउस में हुई मुठभे़ड और पुलिस अधिकारी की शहादत फर्जी थी।`
गुस्ताखी माफ : तो फिर इतने दिनों से मुठभे़ड की न्यायिक जांच की मांग केवल मुसलिम वोट बैंक को भरमाने के लिए कर रहे थे? अल्पसंख्यक वोट बैंक के लिए यूं कब तक घड़ियाली आंसू बहाते रहेंगे? बटला हाउस में एनकाउन्टर में अभी कितने और टर्न लेंगे?
खबर : राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक के एजेंडे में आतंकवाद को शामिल नहीं किए जाने को लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना के बारे में पूछे जाने पर अमर सिंह ने कहा कि उग्रवाद का मुद्दा एजेंडे में शामिल था। मैं इस प्रकार की बातों से परेशान नहीं होता। मैं तथ्यों और अल्पसंख्यकों के मन में जो आशंकाएं हैं, उससे परेशान हूं। उनकी आशंकाआें को दूर किए जाने की जरूरत है।
गुस्ताखी माफ : आशंकाएं तो बहुसंख्यकों के मन में भी हैं। फिर एकपक्षीय राजनीति क्यों? नरेंद्र मोदी आतंकवाद के मुद्दे पर राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में बहस की मांग कर क्या गलती कर रहे हैं। क्या राष्ट्रीय एकता को आतंकवाद से खतरा नहीं है? या फिर आतंकवाद पर चर्चा होने से आपका मुसलिम वोट बैंक नाराज हो सकता है?
खबर : कुछ दिन पहले अमर सिंह ने प्रधानमंत्री से मुलाकात कर जामिया नगर के बटला हाउस में हुई मुठभे़ड की न्यायिक जांच कराने की मांग की। हालांकि, प्रधानमंत्री की ओर से उन्हें किसी तरह का आश्वासन नहीं मिला। ... अमर सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ बैठक के दौरान गृहमंत्री शिवराज पाटिल के इस्तीफे की मांग नहीं उठाई है।
गुस्ताखी माफ : एनकाउंटर के बाद गिरफ्तार छात्रों को कानूनी मदद देने का ऐलान करते समय तो आपने कहा था कि बटला हाउस एनकाउंटर के लिए गृह मंत्री शिवराज पाटिल को नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए। फिर प्रधानमंत्री से मुलाकात में यह मुद्दा यों नहीं उठाया? क्या आपके खाने के दांत और दिखाने के दांत अलग-अलग हैं?
इस देश में जब भी अपराध की कोई बड़ी घटना होती है तो हम तुरंत गृहमंत्री से नैतिक आधार पर इस्तीफे की मांगकर बैठते हैं। ऐसे में जब किसी जिम्मेदार पद पर बैठे बड़े अधिकारी का बेटा ही क्राइम का मास्टरमाइंड निकले तो क्या उससे नैतिक आधार पर इस्तीफा नहीं मांगा जाना चाहिए?
पंजाब के फिल्लौर में पिछले गुरुवार की रात मुंबई के एक व्यापारी से पौने दो करोड़ के हीरे लूट लिए गए थे। लूटकी इतनी बड़ी घटना के बाद पंजाब के पुलिस अधिकारियों में खलबली मच गई थी। पुलिस ने आरोपियों का पता लगाने के लिए कई टीमें बनाई और दो दिनों में ही पूरे मामले का खुलासा कर लूटे गए हीरे बरामद कर लिए। खबरों के मुताबिक लुटेरा निकला विजिलेंस ब्यूरो पटियाला के एसएसपी शिवकुमार का बेटा मोहित शर्मा, जो लुधियाना में हीरों का व्यापारी है। साजिश रचने में उसका सहयोगी निकला खुद एसएसपी का सरकारी गनमैन हरबंस। शक की सूई एसएसपी के एक और गनमैन की ओर इशारा कर रही है, जो अभी पुलिस पकड़ से दूर है। मुंबई के व्यापारी ने गुरुवार दिन में मोहित को हीरे दिखाए थे और रात में लूट की यह वारदात हुई। पुलिस ने मोहित और हरबंस को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस की कामयाबी में मोबाइल काल डिटेल्स की अहम भूमिका रही।
मैं इस राय के बिल्कुल खिलाफ हूं कि बेटे की करतूतों की सजा बाप को दी जाए। लेकिन नैतिक जिम्मेदारी भी कुछ चीज होती है भाई।
विजिलेंस के एसएसपी पर आंतरिक सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी होती है। उसके पास ऐसी महत्वपूर्ण जानकारियां भी होती हैं, जिसके गलत हाथों में पड़ जाने से देश की आंतरिक सुरक्षा को बड़ा खतरा हो सकता है। ऐसे में जब एसएसपी का बेटा क्राइम का मास्टरमाइंड निकले, तो बड़े साहब जिम्मेदारी से कैसे मुक्त हो सकते हैं? सवाल यह हैकि यदि एसएसपी साहब को पता था कि उसका बेटा कानून को ठेंगा दिखा रहा है तो बाप की चुप्पी या अपराध नहीं है? और यदि उसे अपने बेटे के बारे में ही पता नहीं था कि उसका बेटा गलत रास्ते पर चल रहा है, तो फिर या उसे विजिलेंस के एसएसपी जैसे अहम पद रहने दिया जाना चाहिए? देश के नीति निर्धारकों को इस सवाल पर सोचना होगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि एसएसपी शिवकुमार पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ चल रही विजिलेंस जांच और पंजाब के पूर्व डीजीपी एसएस विर्क के खिलाफ हो रही जांच में भी शामिल हैं।
चुनावी तैयारी में जुटी मनमोहन सरकार हताशा में कुछ ऐसे उलटे-सीधे फैसले कर रही है जिसके लिए आने वाली पीढ़ियां उन्हें शायद ही माफ करे। केंद्रीय कैबिनेट ने शुक्रवार को 'अन्य पिछड़ा वर्ग` (ओबीसी) के ज्यादा से ज्यादा लोगों को सरकारी नौकरियों और शैक्षिणिक संस्थाओं में आरक्षण का लाभ देने के नाम पर क्रीमी लेयर की आय सीमा को सालाना 2.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 4.5 लाख रुपये कर दिया है। ऐसा कर न केवल क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की काट निकाली गई है, बल्कि आरक्षण के असली हकदार पिछड़ों को इससे दूर करने की साजिश भी रची गई है।
ओबीसी क्रीमी लेयर के लिए सबसे पहले 1991 में एक लाख रुपये सालाना आय की सीमा तय की गई थी, जिसे 2004 में बढाकर 2.5 लाख रुपये किया गया था। अब इसे 4.5 लाख रुपये सालाना करने का मतलब यह है कि 37 हजार 5 सौ रुपये तक मासिक वेतन पाने वाले हाई प्रोफाइल बाप के कान्वेंट एजूकेटेड शहजादे भी आरक्षण के हकदार होंगे। फिर मजदूरी करने वाली मां के बेटों और झोपड़ियों में सपने बुनने वाले होनहारों के लिए तर की की राह पर दो कदम चलना भी मुश्किल हो जाएगा।
उच्च शिक्षण संस्थानों में खाली रह गई ओबीसी सीटों को अनारक्षित कोटे से भरने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद हड़बड़ी में लिया गया सरकार का यह फैसला खेदजनक है। सही रास्ता तो यह था कि समाज के पिछड़े लोगों को इस काबिल बनाया जाता कि ये सीटें खाली ही न रहतीं। लेकिन मनमोहन सिंह जैसे ग्लोबल अर्थशास्त्री से असली पिछड़ों के कल्याण की उम्मीद करना बेमानी ही लगती है। अब ज्यादातर बड़े अधिकारी और नेताओं के सौभाग्यशाली लाडले आरक्षण के मजे ले सकेंगे। आखिर पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक पर दबदबा भी तो 2.5 लाख से ज्यादा आमदनी वाले 'पिछड़ों` का ही है।
गणित का सीधा सा सिद्धांत है, बड़ा तभी तक बड़ा है जबतक छोटा उससे छोटा बना रहे। यदि पिछड़े ही नहीं रहेंगे, तो पिछड़ों के नाम पर राजनीति की दुकान कैसे चलेगी। वोट बैंक का इतना बड़ा खजाना ऐसे थोड़े ही मिटने दिया जाएगा? और फिर असली पिछड़ों को छलने के लिए कांग्रेस के युवराज तो खेतों में मिट्टी ढो ही रहे हैं। युवराज की कलाबती की झोपड़ी में टूटी चारपाई की जगह यदि पलंग आ जाए तो वह फोटो कहां जाकर खिंचवाएंगे? उम्मीद की जानी चाहिए कि एक दिन आरक्षण के असली हकदार भी जागेंगे और तब न तो ये आरक्षण के ठेकेदार बचेंगे और न ही उनकी दुकानें।
हे परमआदरणीय बापू!
प्रणाम।
कहां और कैसे हैं आप? आज हमने आपका हैप्पी बर्थडे मनाया। आपने कर्म को पूजा माना था, इसलिए आपके हैप्पी बर्थडे पर देशभर में कामकाज बंद रखा गया। मुलाजिम खुश हैं क्योंकि उन्हें दफ्तर नहीं जाना पड़ा, बच्चे खुश हैं क्योंकि स्कूल बंद थे। इस देश को छुट्टियाँ आज सबसे ज्यादा खुशी देती हैं। छुट्टी थी, इसलिए मैं भी आपका हालचाल लेने राजघाट तक चला गया। वहां मिले ज्यादातर लोग आपकी समाधि के पास फोटो खिंचवाने में जुटे थे।
आज देशभर में आपके नाम पर समारोह आयोजित कर झूठी कसमें खाई गईं। आपने कहा था सत्य ही ईश्वर है, इसलिए आज देश में हर कोई सत्य बोलने से डर रहा है। देशभर में सच्चे का मुंह काला है, झूठे का बोलबाला है। झूठ बोलने वालों की दुकानें अच्छी चल रही हैं। जो जितनी सफाई से झूठ बोल रहा है, वह उतना ही ज्यादा सफल है। चाहे वह नेता हो, पदाधिकारी हो या कोई और।
आज कोई भी आपको अपने दिल में नहीं रखना चाहता, सबकी जेबों में आप जरूर मौजूद हैं। असली नोटों की पहचान आपकी फोटो देखकर भी होती है। ऐसी व्यवस्था इसलिए की गई है, ताकि घूस लेते वक्त आपकी फोटो को देख लेने से पाप धुल जाए। जिस दफ्तर में जितना अधिक भ्रष्टाचार है, वहां आपकी उतनी ही बड़ी फोटो लगी है। आपकी बड़ी फोटो के नीचे बैठकर नेता और अफसर छोटी फोटो वाले नोट धरल्ले से वसूल रहे हैं। कुल मिलाकर नेताओं ने गांधीवाद से अपना नाता पूरी तरह तोड़ लिया है। हां! कुछ भाई लोग भाईगीरी छोड़कर गांधीगीरी कर रहे हैं।
आप जहां भी जाते थे, कारवां वहीं पहुंच जाता था। आज के नेता राजधानी में बैठकर 'राजधानी चलो` का नारा देते हैं और भीड़ को भाड़े की गाड़ियों में ढोकर वहां पहुंचाया जाता है। गांवों में पैदल मार्च करने वाले नेता आज गांवों की ही धूल फांकते रह जाते हैं, हेलीकॉप्टर से दौरा करने वाले नेताओं की तूती बोलती है।
आपने विदेश में हुनर सीखकर हिंदुस्तान को अपनी कर्मभूमि बनाया। आज के युवा हिंदुस्तान में हुनर सीखकर विदेश जाने के सपने संजोते हैं। या करें, अपने देश में नौकरियों की भारी कमी है बापू! आपने देशवासियों को मुफ्त में समुद्र से नमक बनाना सिखाया था, लेकिन आज देश मल्टीनेशनल कंपनियों का बनाया नमक दस से पंद्रह रुपये किलो खरीद कर खा रहा है। मुझे खुशी है कि मैं आपका बनाया नमक नहीं खा रहा हूं, वरना नमक का कर्ज चुकाना भारी पड़ जाता। फिर भी आपको यह खत लिखकर सावधान कर दे रहा हूं, यदि आपका मन दोबारा इस धरती पर जनम लेने का हो रहा हो तो आप सौ बार सोच लें।
नवरात्र की पूर्व संध्या पर सोमवार को गुजरात के मोडासा (साबरकांठा) और महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए विस्फोटों में सात लोगों की मौत हो गई और सौ से अधिक लोग घायल हो गए। स्पष्ट है दिल्ली के चंद दिनों बाद ही आतंकियों ने गुजरात और महाराष्ट्र को निशाना बनाया है। दोनों स्थानों पर धमाकों में मोटरसाइकिल का इस्तेमाल किया गया। इसी दिन उड़ीसा के हिंसा प्रभावित कंधमाल के कई कस्बों में भी कम क्षमता वाले कई धमाके हुए, हालांकि इनमें कोई हताहत नहीं हुआ। उधर, अहमदाबाद के कालूपुर में 17 देसी बम बरामद किए गए।
संकेत साफ हैं, हिंदुस्तान में आतंकवाद बड़े शहरों या किसी खास रीजन तक सीमित नहीं रहा। कुछ समय पहले तक यहां आतंकवाद रीजनल था। कभी कश्मीर में था तो कभी पंजाब में। कभी नार्थ ईस्ट में था तो कभी कहीं और। लेकिन अब यह कस्बों तक पांव पसार रहा है। रोज नए खुलासे हो रहे हैं, जिनमें आतंक के तार नए-नए शहरों से जुड़ते नजर आ रहे हैं। अगर हालात यही रहे तो यह जल्दी ही पूरे देश में फैल जाएगा।
केंद्रीय गृह मंत्रालय की ही मानें तो जयपुर विस्फोट के बाद 140 दिनों में 44 विस्फोट हुए हैं, जिनमें 152 लोग मारे गए और करीब 450 घायल हुए हैं। दुखद यह है कि आतंकी गतिविधियों की सर्वाधिक मार झेलने के बावजूद हम आतंकवाद को मात देने की कोई कारगर रणनीति नहीं बना सके हैं। आतंकवाद से लड़ने के लिए देश में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर कोई सर्वसम्मति नहीं बना सके हैं। आम आदमी की बात तो दूर, राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख राजनेता तक इस बात पर एकमत नहीं हैं कि आतंकवाद के मामले में देश को कितनी सख्ती बरतनी चाहिए। देश को पोटा चाहिए या नहीं, इसे लेकर विभिन्न नेताओं के रोज विरोधाभासी बयान आ रहे हैं।
आतंकवाद से लड़ने को लेकर दुनियाभर में भारत की छवि एक नरम राष्ट्र की है। बड़े आतंकवादी और माफिया सरगना भी पकड़े जाने के बाद सालों तक हमारी जेलों में मेहमान बनकर मुफ्त की रोटियां चट करते रहते हैं। इस दौरान उन्हें छुड़ाने के लिए उनके गुर्गे तरह-तरह के तिकड़म आजमाते हैं। दूसरी ओर माफिया सरगना जेल से ही राजनीति में किस्मत आजमाने के सपने पालने लगते हैं। देश में लंबे समय से एक ऐसी न्यायिक व्यवस्था की मांग उठती रही है, जिसमें बड़े अपराधियों की सजा का फैसला जल्द-से-जल्द हो सके। विस्फोटकों में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों को रखने, बेचने, एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने और इस्तेमाल करने संबंधी कानून में भी तत्काल संशोधन की जरूरत है।
आतंकियों का न कोई मजहब होता है, न ही देश। वे सिर्फ और सिर्फ मानवता के दुश्मन होते हैं। इसलिए समय की मांग है कि सभी दल वोट बैंक की राजनीति छोड़कर और सभी संस्थाएं निजी हित को परे रखकर आतंकवाद को कुचलने के लिए तुरंत एक राय कायम कायम करें।
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गुस्ताखी माफ : वीसी साहब! आपके इरादे नेक नहीं लगते।
कुछ लोग काम करने की जगह ढिंढोरा ज्यादा पीटते हैं। ऐसा ही कुछ जामिया मिलिया इसलामिया विश्वविद्यालय के कुलपति मुशीरुल हसन कर रहे हैं। आपने पहले बकायदा संवाददाता सम्मेलन बुलाकर धमाकेदार ऐलान किया कि आतंकी बताए जा रहे अपने दो छात्रों को आप कानूनी मदद मुहैया कराएंगे। फिर लॉबिंग में जुट गए और शुक्रवार को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह के यहां मत्था टेक आए। नतीजा यह हुआ कि जहां कांग्रेस नेता और रामविलास पासवान सहित कई केंद्रीय मंत्री आपके समर्थन में ताल ठोंक रहे हैं, वहीं भाजपाई विरोध में मुखर हैं।
अजी जनाब! आपको अपने बच्चों की मदद करनी थी, करते। किसने रोका है। मदद तो करनी ही चाहिए एक गुरु को अपने शिष्यों की। पहले उन्हें बेगुनाह साबित करते, फिर उस साजिश को भी बेनकाब करते जो आपकी नजर में रची गई थी। लेकिन आपने कुछ करने से पहले चीख-चिल्ला कर एक बात साबित कर दी है कि आपके इरादे काम मुकम्मल होने से ज्यादा पब्लिसिटी पाने की है। जहां तक मैं जानता हूं, इसलाम में जब जकात दी जाती है तो किसी को पता नहीं चलता। यही शर्त मददगार के लिए भी लागू होती है। लेकिन मदद देने से पहले उसे इस तरह से प्रचारित करने के पीछे छिपी आपकी मंशा खतरनाक लगती है।
हिंदुस्तान में आज भी लोग जब अपनी औलाद खराब निकल जाती है तो अखबारों में इश्तिहार छपवा देते हैं कि हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन उसी हिंदुस्तान का कानून फांसी की सजा पाए गुनहगार से भी उसकी आखिरी इच्छा पूछता है। हमारा कानून सबको कानूनी मदद भी देता है। आप भी दे रहे हैं। यह कतई गुनाह नहीं है। लेकिन इसके पीछे जो राजनीति हो रही है, वह गुनाह है।
मेरा आपसे एक सवाल है, जबसे होश संभाला कभी मुरादाबाद में दंगे देखे तो कभी इलाहाबाद में, कभी मेरठ को जलते देखा तो कभी गुजरात को, या आपलोगों ने शिद्दत के साथ कोई लड़ाई लड़ी? नहीं न। अगर लड़ी होती तो आज पुलिस फोर्स में पढ़े-लिखे मुसलमान युवकों की संख्या काफी होती। जनाब! आप उस यूपीए की गोद में बैठ रहे हैं, जिसके नेताओं ने पिछले करीब पांच सालों में मुसलिम वोट बैंक के लिए मौके मिलते ही घड़ियाली आंसू बहाने के अलावा कुछ खास नहीं किया। आप लोग सच्ची बात करने में क्यों हैं? क्या आपने वह कानून पढ़ा है, जिसे पोटा की जगह कांग्रेस ने बनाया है? सिर्फ नाम हटाया है, प्रावधान वही हैं।
आतंकवाद का न कोई धर्म होता है, न ही ईमान। गुरुओं ईमान जरूर होता है। सबसे पहले गुरुओं को अपने अंदर झांक कर देखना पड़ेगा कि उनकी शिक्षा में कहां कमी रह गई जो हालात इतने खराब हो रहे हैं और युवा भटक रहे हैं।
मेरी दुआ है कि आप अपने मकसद में कामयाब हों और अपने बच्चों को बेगुनाह साबित कर सकें। लेकिन अगर वे वाकई में आतंकवादियों की नापाक साजिशों का शिकार होकर गलत रास्ते पर चल निकले हैं, तो उन्हें रास्ते पर लाने के लिए आपने कुछ सोचा है? अगर आपके छात्रों पर आतंकियों का साथ देने का आरोप सच साबित हो गया तब आप या करेंगे? यह भी आपको अभी ही सोचना पड़ेगा। आपके साथ उन तमाम लोगों को सोचना पड़ेगा, जिन्होंने इस मामले को राजनीतिक बना दिया है।
हिंदी ब्लाग की बढ़ती लोकप्रियता के बीच यह सवाल बहस का विषय बनता जा रहा है कि अनाम टिप्पणीकारों को कितनी आजादी दी जाए? सुलझे ब्लागर अपनी पोस्ट पर पक्ष-विपक्ष में की गई तमाम टिप्पणियों का तहेदिल से स्वागत करने को हमेशा उत्सुक रहते हैं। लेकिन पहचान छिपाकर की गई अनाम टिप्पणियां अकसर ब्लागरों की भावनाओं का फर्जी एनकाउंटर करती दिख रही हैं। सुप्रतिम बनर्जी की ताजा पोस्ट 'बटला हाउस : क्या सच, क्या झूठ` और इस पर अनाम 'शूटर` द्वारा दागी गई टिप्पणियों से इसे समझा जा सकता है।
सुप्रतिम ने दिल्ली स्थित बटाला हाउस में हुए एनकाउंटर को अपनी ओर से सही या गलत न ठहराते हुए दोनों पक्षों की भावनाओं को पर्याप्त सम्मान दिया गया है। उन्होंने एनकाउंटर को लेकर आम भारतीय के मन में उठ रहे तमाम सवालों को साहस के साथ बड़ी ही संजीदगी से रखा है। साथ ही अपनी ओर से दो अत्यंत सामयिक मुद्दे उठाए हैं-
'एनकाउंटर फर्जी था या नहीं, ये तो अलहदा मसला है, लेकिन अगर मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी में आजादी के इतने सालों बाद भी पूरी व्यवस्था के खिलाफ ऐसा घोर अविश्वास है, तो ये जरूर विचारणीय है।`
'एनकाउंटर को लेकर उठे सवाल और जारी बहस से एक बात तो साफ हो गई है कि अब लोग पहले की तरह सिर्फ पुलिस की बताई कहानी पर ही आसानी से ऐतबार करने को तैयार नहीं हैं... और ये व त की जरूरत है कि पुलिस भी अपने कामकाज में पारदर्शिता लाए। ताकि एनकाउंटरों पर सवाल तो उठे, लेकिन अगर पुलिस सही है तो उसके पास इन सवालों का सही जवाब जरूर हो।`
ऊपर के दोनों सवालों के पीछे छिपी ब्लागर की वास्तविक भावना को उनकी पूरी पोस्ट पढ़े बिना नहीं समझा जा सकता। लेकिन पोस्ट पढ़े बिना ही धड़ाधड़ टिपियाणे वाले एक पाठक को इनमें से किसी सवाल से ऐसी मिर्ची लगी कि उन्होंने लिख डाला- 'धिक्कार है आप और आप जैसे बेबकूफ लोगों पर।` उनकी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए अनाम 'शूटर` ने ठोका - ' क्या करना चाहिए पुलिस को? पहले मीडिया को फोन करे कि देखो आतंवादी वहां छिपे है हम जा रहे हैं आप भी कैमरा ले लो?` हालांकि इससे आगे बहुत कुछ लिखकर इस 'शूटर` ने अपनी गंभीरता का परिचय भी दिया है लेकिन अपनी पहचान छिपाकर वार करने को क्या कहेंगे?
इस टिप्पणी पर हरि जोशी ने बहुत सही फरमाया है- 'है ईश्वर, इन नासमझ टिप्पणीकर्ताओं को क्षमा करना। ये नहीं जानते कि इनमें और बटला हाउस पर खड़े होकर बकबास करने वालों में कोई फर्क नहीं हैं। इन सभी के पास एक जैसा ही चश्मा है, सिर्फ ब्रांड बदल गया है।` लेकिन अनाम शूटर ने उनपर जवाबी फायरिंग भी कर दी- '...तुम सेन्सेशनल सीकर तो जरूरत से ज्यादा अक्ल वाले हो, एम्बेड जर्नलिस्ट हो, तुम्हारी जगह कहां होगी?`
ऐसी टिप्पणियां गंभीर मुद्दों पर सार्थक बहस को बकबास में डुबो देती हैं। ऐसे अनाम टिप्पणीकारों को क्या कहेंगे आप?